Friday, December 17, 2010

देहावसान : वयोवृद्ध शिक्षाविद-अर्थशास्त्री प्रो. सत्यसहाय श्रीवास्तव 

  -संजीव वर्मा 'सलिल'

बिलासपुर, छत्तीसगढ़ २८.११.२०१०. स्थानीय अपोलो चिकित्सालय में आज देर रात्रि विख्यात अर्थशास्त्री, छत्तीसगढ़ राज्य में महाविद्यालायीन शिक्षा के सुदृढ़ स्तम्भ रहे अर्थशास्त्र की ३ उच्चस्तरीय पुस्तकों के लेखक, प्रादेशिक कायस्थ महासभा मध्यप्रदेश के पूर्व प्रांतीय अध्यक्ष रोटेरियन, लायन प्रो. सत्य सहाय का लम्बी बीमारी के पश्चात् देहावसान हो गया. खेद है कि छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार आपने प्रदेश के इस गौरव पुरुष के प्रति पूरी तरह अनभिज्ञ तथा असावधान रही. वर्ष १९९४ से पक्षाघात (लकवे) से पीड़ित प्रो. सहाय शारीरिक पीड़ा को चुनौती देते हुए भी सतत सृजन कर्म में संलग्न रहे. शासन सजग रहकर उन्हें राजकीय अतिथि के नाते एम्स दिल्ली या अन्य उन्नत चिकित्सालय में भेजकर श्रेष्ठ विशेषज्ञों की सेवा उपलब्ध कराता तो वे रोग-मुक्त हो सकते थे.

१६ वर्षों से लगातार पक्षाघात (लकवा) ग्रस्त तथा शैयाशाई होने पर भी उनके मन-मष्तिष्क न केवल स्वस्थ्य-सक्रिय रहा अपितु उनमें सर्व-हितार्थ कुछ न कुछ करते रहने की अनुकरणीय वृत्ति भी बनी रही. वे लगातार न केवल अव्यवसायिक सामाजिक पत्रिका 'संपर्क' का संपादन-प्रकाशन करते रहे अपितु इसी वर्ष उन्होंने 'राम रामायण' शीर्षक लघु पुस्तक का लेखन-प्रकाशन किया था. इसमें रामायण का महत्त्व, रामायण सर्वप्रथम किसने लिखी, शंकर जी द्वारा तुलसी को रामकथा साधारण बोल-चाल की भाषा में लिखने की सलाह, जब तुलसी को हनुमानजी ने श्रीराम के दर्शन करवाये, रामकथा में हनुमानजी की उपस्थिति, सीताजी का पृथ्वी से पैदा होना, रामायण कविता नहीं मंत्र, दशरथ द्वारा कैकेयी को २ वरदान, श्री राम द्वारा श्रीभरत को अयोध्या की गद्दी सौपना, श्री भारत द्वारा कौशल्या को सती होने से रोकना, रामायण में सर्वाधिक उपेक्षित पात्र उर्मिला, सीता जी का दूसरा वनवास, रामायण में सुंदरकाण्ड, हनुमानजी द्वारा शनिदेव को रावण की कैद से मुक्त कराना, परशुराम प्रसंग की सचाई, रावण के अंतिम क्षण, लव-कुश काण्ड, सीताजी का पृथ्वी की गोद में समाना, श्री राम द्वारा बाली-वध, शूर्पनखा-प्रसंग में श्री राम द्वारा लक्ष्मण को कुँवारा कहा जाना, श्री रामेश्वरम की स्थापना, सीताजी की स्वर्ण-प्रतिमा, रावण के वंशज, राम के बंदर, कैकेई का पूर्वजन्म, मंथरा को अयोध्या में रखेजाने का उद्देश्य, मनीराम की छावनी, पशुओं के प्रति शबरी की करुणा, सीताजी का राजयोग न होना, सीताजी का रावण की पुत्री होना, विभीषण-प्रसंग, श्री राम द्वारा भाइयों में राज्य-विभाजन आदि जनरूचि के रोचक प्रसंगों का उल्लेख किया है. गागर में सागर की तरह विविध प्रसंगों को समेटे यह कृति प्रो. सहाय की जिजीविषा का पुष्ट-प्रमाण है.

प्रो. सत्यसहाय जीवंत व्यक्तित्व, कर्मठ कृतित्व तथा मौलिक मतित्व की त्रिविभूति-संपन्न ऐसे व्यक्तित्व थे जिन पर कोई भी राज्य-सत्ता गर्व कर सकती है. ग्राम रनेह (राजा नल से समबन्धित ऐतिहासिक नलेह), तहसील हटा (राजा हट्टेशाह की नगरी), जिला दमोह (रानी दमयन्ती की नगरी) में जन्में, बांदकपुर स्थित उपज्योतिर्लिंग जागेश्वरनाथ पुण्य भूमि के निवासी संपन्न-प्रतिष्ठित समाजसेवी स्व. सी.एल. श्रीवास्तव तथा धर्मपरायण स्व. महारानी देवी के कनिष्ठ पुत्र सत्यसहाय की प्राथमिक शिक्षा रनेह, ग्राम, उच्चतर माध्यमिक शिक्षा दमोह तथा महाविद्यालयीन शिक्षा इलाहाबाद में अग्रज स्व. पन्नालाल श्रीवास्तव (आपने समय के प्रखर पत्रकार, दैनिक लीडर तथा अमृत बाज़ार पत्रिका के उपसंपादक, पत्रकारिता पर महत्वपूर्ण पुस्तक के लेखक) के सानिंध्य में पूर्ण हुई. अग्रज के पद-चिन्हों पर चलते हुए पत्रकारिता के प्रति लगाव स्वाभाविक था. उनके कई लेख, रिपोर्ताज, साक्षात्कार आदि प्रकाशित हुए. वे लीडर पत्रिका के फ़िल्मी स्तम्भ के संपादक रहे. उनके द्वारा फ़िल्मी गीत-गायक स्व. मुकेश व गीता राय का साक्षात्कार बहुचर्चित हुआ.

उन्हीं दिनों महात्मा गाँधी के निजी सचिव स्व. महेशदत्त मिश्र पन्नालाल जी के साथ रहकर राजनीति शास्त्र में एम.ए. कर रहे थे. तरुण सत्यसहाय को गाँधी जी की रेलयात्रा के समय बकरीका ताज़ा दूध पहुँचाने का दायित्व मिला. गाँधी जी की रेलगाड़ी इलाहाबाद पहुँची तो भरी भीड़ के बीच छोटे कद के सत्यसहाय जी नजर नहीं आये, रेलगाड़ी रवाना होने का समय हो गया तो मिश्रजी चिंतित हुए, उन्होंने आवाज़ लगाई 'सत्य सहाय कहाँ हो? दूध लाओ.' भीड़ में घिरे सत्यसहाय जी जोर से चिल्लाये 'यहाँ हूँ' और उन्होंने दूध का डिब्बा ऊपर उठाया, लोगों ने देखा मिश्र जी डब्बा पकड़ नहीं पा रहे और रेलगाड़ी रेंगने लगी तो कुछ लम्बे लोगों ने सहाय जी को ऊपर उठाया, मिश्र जी ने लपककर डब्बा पकड़ा. बापू ने खिड़की से यह दृश्य देखा तो खिड़कीसे हाथ निकालकर उन्हें आशीर्वाद दिया. मिश्रा जी के सानिंध्य में वे अनेक नेताओं से मिले. सन १९४८ में अर्थशास्त्र में एम.ए. करने के पश्चात् नव स्वतंत्र देश का भविष्य गढ़ने और अनजाने क्षेत्रों को जानने-समझने की ललक उन्हें बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ले आयी.

पन्नालाल जी अमृत बाज़ार पत्रिका और लीडर जैसे राष्ट्रीय अंग्रेजी अख़बारों में संवाददाता और उपसंपादक रहे थे. वे मध्य प्रान्त और विदर्भ के नेताओं को राष्ट्री क्षितिज में उभारने में ही सक्रिय नहीं रहे अपितु मध्य अंचल के तरुणों को अध्ययन और आजीविका जुटने में भी मार्गदर्शक रहे. विख्यात पुरातत्वविद राजेश्वर गुरु उनके निकट थे, जबलपुर के प्रसिद्द पत्रकार रामेश्वर गुरु को अपना सहायक बनाकर पन्नालाल जी ने संवाददाता बनाया था. कम लोग जानते हैं मध्य-प्रदेश उच्च न्यायालय के विद्वान् अधिवक्ता श्री राजेंद्र तिवारी भी प्रारंभ में प्रारंभ में पत्रकार ही थे. उन्होंने बताया कि वे स्थानीय पत्रों में लिखते थे. गुरु जी का जामाता होने के बाद वे पन्नालाल जी के संपर्क में आये तो पन्नालाल जी ने अपना टाइपराइटर उन्हें दिया तथा राष्ट्रीय अख़बारों से रिपोर्टर के रूप में जोड़ा. अपने अग्रज के घर में अंचल के युवकों को सदा आत्मीयता मिलते देख सत्य सहाय जी को भी यही विरासत मिली.

आदर्श शिक्षक तथा प्रशासनविद:

बुंदेलखंड में कहावत है 'जैसा पियो पानी, वैसी बोलो बनी, जैसा खाओ अन्न, वैसा होए मन'- सत्यसहाय जी के व्यक्तित्व में सुनार नदी के पानी साफगोई, नर्मदाजल की सी निर्मलता व गति तथा गंगाजल की पवित्रता तो थी ही बिलासपुर छत्तीसगढ़ में बसनेपर अरपा नदीकी देशजता और शिवनाथ नदीकी मिलनसारिता सोने में सुहागा की तरह मिल गई. वे स्थानीय एस.बी.आर. महाविद्यालय में अर्थशास्त्र के व्याख्याता हो गये. उनका प्रभावशाली व्यक्तित्व, सरस-सटीक शिक्षण शैली, सामयिक उदाहरणों से विषय को समझाने तथा विद्यार्थी की कठिनाई को समझकर सुलझाने की प्रवृत्ति ने उन्हें सर्व-प्रिय बना दिया. जहाँ पहले छात्र अर्थशास्त्र विषय से दूर भागते थे, अब आकर्षित होने लगे. सन १९६४ तक उनका नाम स्थापित तथा प्रसिद्ध हो चुका था. इस मध्य १९५८ से १९६० तक उन्होंने नव-स्थापित 'ठाकुर छेदीलाल महाविद्यालय जांजगीर' के प्राचार्य का चुनौतीपूर्ण दायित्व सफलतापूर्वक निभाया और महाविद्यालय को सफलता की राह पर आगे बढ़ाया. उस समय शैक्षणिक दृष्टि से सर्वाधिक पिछड़े राज्य छत्तीसगढ़ में उच्च शिक्षा की दीपशिखा प्रज्वलित करनेवालों में अग्रगण्य स्व. सत्य सहाय अपनी मिसाल आप थे.जांजगीर महाविद्यालय सफलतापूर्वक चलने पर वे वापिस बिलासपुर आये तथा योजना बनाकर एक अन्य ग्रामीण कसबे खरसिया के विख्यात राजनेता-व्यवसायी स्व. लखीराम अग्रवाल प्रेरित कर महाविद्यालय स्थापित करने में जुट गये. लम्बे २५ वर्षों तक प्रांतीय सरकार से अनुदान प्राप्तकर यह महाविद्यालय शासकीय महाविद्यालय बन गया. इस मध्य प्रदेश में विविध दलों की सरकारें बनीं... लखीराम जी तत्कालीन जनसंघ से जुड़े थे किन्तु सत्यसहाय जी की समर्पणवृत्ति, सरलता, स्पष्टता तथा कुशलता के कारण यह एकमात्र महाविद्यालय था जिसे हमेशा अनुदान मिलता रहा.

उन्होंने रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर में अधिष्ठाता छात्र-कल्याण परिषद्, अधिष्ठाता महाविद्यालयीन विकास परिषद् तथा निदेशक जनजाति प्रशासनिक सेवा प्रशिक्षण के रूप में भी अपनी कर्म-कुशलता की छाप छोड़ी.
आपके विद्यार्थियों में स्व. बी.आर. यादव, स्व. राजेंद्र शुक्ल. श्री अशोक राव, श्री सत्यनारायण शर्मा आदि अविभाजित मध्यप्रदेश / छतीसगढ़ के कैबिनेट मंत्री, पुरुषोत्तम कौशिक केन्द्रीय मंत्री तथा स्व. श्रीकांत वर्मा सांसद और राष्ट्रीय राजनीति के निर्धारक रहे. अविभाजित म.प्र. के वरिष्ठ नेता स्वास्थ्य मंत्री स्व. डॉ. रामाचरण राय, शिक्षामंत्री स्व. चित्रकांत जायसवाल से उनके पारिवारिक सम्बन्ध थे. उनके अनेक विद्यार्थी उच्चतम प्रशासनिक पदों पर तथा कई कुलपति, प्राचार्य, निदेशक आदि भी हुए किन्तु सहाय जी ने कभी किसीसे नियम के विपरीत कोई कार्य नहीं कराया. अतः उन्होंने सभी से सद्भावना तथा सम्मान पाया.

सक्रिय समाज सेवी:

प्रो. सत्यसहाय समर्पित समाज सुधारक भी थे. उन्होंने छतीसगढ़ अंचल में लड़कियों को शिक्षा से दूर रखने की कुप्रथा से आगे बढ़कर संघर्ष किया. ग्रामीण अंचल में रहकर तथा सामाजिक विरोध सहकर भी उन्होंने न केवल अपनी ४ पुत्रियों को स्नातकोत्तर शिक्षा दिलाई अपितु २ पुत्रियों को महाविद्यालयीन प्राध्यापक बनने हेतु प्रोत्साहित तथा विवाहोपरांत शोधकार्य हेतु सतत प्रेरित किया. इतना ही नहीं उन्होंने अपने संपर्क के सैंकड़ों परिवारों को भी लड़कियों को पढ़ाने की प्रेरणा दी.

स्वेच्छा से सेवानिवृत्ति के पश्चात् वे सामाजिक ऋण-की अदायगी करने में जुट गये. प्रादेशिक चित्रगुप्त महासभा मध्य प्रदेश के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने जबलपुर, बरमान (नरसिंहपुर), उज्जैन, दमोह, बालाघाट, बिलासपुर आदि अनेक स्थानों पर युवक-युवती, परिचय सम्मलेन, मितव्ययी दहेज़रहित सामूहिक आदर्श विवाह सम्मलेन आदि आयोजित कराये. वैवाहिक जानकारियाँ एकत्रित कर चित्राशीष जबलपुर तथा संपर्क बिलासपुर पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने अभिभावकों को उपलब्ध कराईं.
विविध काल खण्डों में सत्यसहाय जी ने लायन तथा रोटरी क्लबों के माध्यम से भी सामाजिक सेवा की अनेक योजनाओं को क्रियान्वित कर अपूर्व सदस्यतावृद्धि हेतु श्रेष्ठ गवर्नर पदक प्राप्त किये. वे जो भी कार्य करते थे दत्तचित्त होकर लक्ष्य पाने तक करते थे.

छतीसगढ़ शासन जागे :

बिलासपुर तथा छत्तीसगढ़ के विविध अंचलों में प्रो. असत्य सहाय के निधन का समाचार पाते ही शोक व्याप्त हो गया. छतीसगढ़ तथा मध्य प्रदेश के अनेक महाविद्यालयों ने उनकी स्मृति में शोक प्रस्ताव पारित किये. अभियान सांस्कृतिक-साहित्यिक संस्था जबलपुर, रोटरी क्राउन जबलपुर, रोटरी क्लब बिलासपुर, रोटरी क्लब खरसिया, लायंस क्लब खरसिया, अखिल भारतीय कायस्थ महासभा, सनातन कायस्थ महापरिवार मुम्बई, विक्रम महाविद्यालय उज्जैन, शासकीय महाकौशल महाविद्यालय जबलपुर, कायस्थ समाज बिलासपुर, कायस्थ कल्याण परिषद् बिलासपुर, कायस्थ सेना जबलपुर आदि ने प्रो. सत्यसहाय के निधन पर श्रैद्धांजलि व्यक्त करते हुए उन्हें युग निर्माता निरूपित किया है. छत्तीसगढ़ शासन से अपेक्षा है कि खरसिया महाविद्यालय में उनकी प्रतिमा स्थापित की जाये तथा रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर एवं गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर में अर्थशास्त्र विषयक उच्च शोध कार्यों हेतु प्रो. सत्यसहाय शोधपीठ की स्थापना की जाए.

दिव्यनर्मदा परिवार प्रो. सत्यसहाय के ब्रम्हलीन होने को शोक का कारण न मानते हुए इसे देह-धर्म के रूप में विधि के विधान के रूप में नत शिर स्वीकारते हुए संकल्प लेता है कि दिवंगत के आदर्शों के क्रियान्वयन हेतु सतत सक्रिय रहेगा. हिन्दी को विश्व भाषा के रूप में विकसित करने की प्रो. सत्यसहाय की मनोकामना को मूर्तरूप देने के लिये सतत प्रयास जारी रहेंगे. आप सब इस पुनी कार्य में सहयोगी हों, यही सच्ची कर्मांजलि होगी.

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प्रो. सत्यसहाय श्रीवास्तव के प्रति भावांजलि:
तुममें जीवित था...
संजीव 'सलिल'
*
तुममें जीवित था इतिहास,
किन्तु न था युग को आभास...
*
पराधीनता के दिन देखे.
सत्याग्रह आन्दोलन लेखे..
प्रतिभा-पूरित सुत 'रनेह' के,
शत प्रसंग रोचक अनलेखे..
तुम दमोह के दीपक अनुपम
देते दिव्य उजास...
*
गंगा-विश्वनाथ मन भाये,
'छोटे' में विराट लख पाये..
अरपा नदी बिलासा माई-
छतीसगढ़ में रम harhsaaye..
कॉलेज-अर्थशास्त्र ने पाया-
नव उत्थान-विकास...
*
साक्ष्य खरसिया-जांजगीर है.
स्वस्थ रखी तुमने नजीर है..
व्याख्याता-प्राचार्य बहुगुणी
कीर्ति-विद्वता खुद नजीर है..
छात्र-कल्याण अधिष्ठाता रह-
हुए लोकप्रिय खास...
*
कार्यस्थों को राह दिखायी.
लायन-रोटरी ज्योति जलायी.
हिंद और हिन्दी के वाहक
अमिय लुटाया हो विषपायी..
अक्षय-निधि आशा-संबल था-
सार्थक किये प्रयास...
*
श्रम-विद्या की सतत साधना.
विमल वन्दना, पुण्य प्रार्थना,
तुम अशोक थे, तुम अनूप थे-
महावीर कर विपद सामना,
नेह-नर्मदा-सलिल पानकर-
हरी पीर-संत्रास...
*
कीर्ति-कथा मोहिनी अगेह की.
अर्थशास्त्र-शिक्षा विदेह सी.
सत-शिव-सुंदर की उपासना-
शब्दाक्षर आदित्य-गेह की..
किया निशा में भी उजियारा.
हर अज्ञान-तिमिर का त्रास...
*
संस्मरण बहुरंगी अनगिन,
क्या खोया?, क्या पाया? बिन-गिन..
गुप्त चित्त में चित्र चित्रगुप्त प्रभु!
कर्म-कथाएँ लिखें पल-छीन.
हरी उपेक्षित मन की पीड़ा
दिया विपुल अधरों को हास...
*
शिष्य बने जो मंत्री-शासन,
करें नीति से जन का पालन..
सत्ता जन-हित में प्रवृत्त हो-
दस दिश सुख दे सके सु-शासन..
विद्यानगर बसा सामाजिक
नायक लिये हुलास...
*
प्रखर कहानी कर्मयोग की,
आपद, श्रम साफल्य-योग की.
थी जिजीविषा तुममें अनुपम-
त्याग समर्पण कश्र-भोग की..
बुन्देली भू के सपूत हे!
फ़ैली सुरभि-सुवास...
******
प्रो. सत्यसहाय श्रीवास्तव के प्रति गीतांजलि :

शत नमन...

*
शत नमन, हे महामानव!
शत नमन...
*
धरा से उठकर गगन पर छा गये,
स्वजन, परिजन, पुरजनों को भा गये..
कार्य में स्थित रहे कार्यस्थ हे!
काय-स्थित दैव को तुम भा गये..
हुआ है स्तब्ध यह सारा चमन...
*
अमिट प्रतिभा, अजित जीवट के धनी.
बहुमुखी सामर्थ्य, थे पक्के धुनी..
विरल देखे, अब कहाँ ऐसे सु-जन?
अनुकरण युग कर सके, वैसे गुनी..
सतत उन्नति की रही तुममें लगन...
*
दिशा-दर्शक! स्वप्न कर साकार तुम.
दे सके माटी को शत आकार तुम..
संस्कारित सकल पीढ़ी को किया-
असहमत को भी रहे स्वीकार तुम.
काश हममें भी जले ऐसी अगन...
*****
प्रो. सत्यसहाय श्रीवास्तव के प्रति शब्द-सुमनांजलि
नमन हमारे...
संजीव 'सलिल'
*
पूज्य चरण में अर्पित हैं
शत नमन हमारे...
*
मन में यादों के सुगंध है,
मिला सदा आशीष.
जितना तुमने दिया, शत गुणा
तुमको दे जगदीश.
स्वागत हेतु लगे सुरपुर में
बंदनवारे....
*
तुम भास्कर, हम हुए प्रकाशित,
हैं आभारी.
बिना तुम्हारे हैं अपूर्ण हम
हे यशधारी..
यादों का पाथेय लगाये
हमें किनारे...
*
नेक प्रेरणा दे अनेक को,
विदा हो गये.
खोज रहे हम, तुम विदेह में
लीन हो गये..
मन प्राणों को दीपित करते
कर्म तुम्हारे...
*****
प्रो सत्य सहाय श्रीवास्तव के प्रति श्रृद्धा-सुमन :
संजीव 'सलिल'
*
षट्पदी
मौत ले जाती है काया, कार्य होते हैं अमर.
ज्यों की त्यों चादर राखी, निर्मल बुन्देली पूज्यवर!
हे कलम के धनी! शिक्षादान आजीवन किया-
हरा तम अज्ञानका, जब तक जला जीवन-दिया.
धरा छतीसगढ़ की ऋण से उऋण हो सकती नहीं.
'सलिल' सेवा-साधना होती अजर मिटती नहीं..
******
चतुष्पदियाँ / मुक्तक
मन-किवाड़ पर दस्तक देता, सुधि का बंदनवार.
दीप जलाये स्मृतियों के, झिलमिल जग उजियार.
इस जग से तुम चले गये, मन से कैसे जाओगे?
धूप-छाँव में, सुख-दुःख में, सच याद बहुत आओगे..
*****
नहीं किताबी शिक्षक थे तुम, गुरुवत बाँटा ज्ञान.
शत कंकर तराशकर शंकर, गढ़े बिना अभिमान..
जीवन गीता, अनुभव रामायण के अनुपम पाठ-
श्वास-श्वास तुम रहे पढ़ाते, बन रस-निधि, रस-खान..
*****
सफल उसी का जीवन, जिसका होता सत्य-सहाय.
सत्य सहाय न हो पाये तो मानव हो निरुपाय..
जो होता निरुपाय उसीका जीवन निष्फल जान-
स्वप्न किये साकार अनेकों के, रच नव अध्याय..
******
पुण्य फले तब ही जुड़ पाया, तुमसे स्नेहिल नाता.
तुममें वाचिक परंपरा को, मूर्तित होते पाया..
जटिल शुष्क नीरस विषयों को सरस बना समझाते-
दोष-हरण सद्गुण-प्रसार के थे अनुपम व्याख्याता..
*****
तुम गये तो शून्य सा मन हो गया है.
है जगत में किन्तु लगता खो गया है..
कभी लगता आँख में आँसू नहीं हैं-
कभी लगता व्यथित हो मन रो गया है..
*****
याद तुम्हारी गीत बन रही,
जीवन की नव रीत बन रही.
हार मान हर हार ग्रहण की-
श्वास-आस अब जीत बन रही..
*****
अश्रुधारा से तुम्हें तर्पण करेंगे.
हृदय के उद्गार शत अर्पण करेंगे..
आत्म पर जब भी 'सलिल' संदेह होगा-
सुधि तुम्हारी कसौटी-दर्पण करेंगे..
*****
तुम थे तो घर-घर लगता था.
हर कण अपनापन पगता था..
पारस परस तुम्हारा पाकर-
सोया अंतर्मन जगता था..
*****
सुधियों के दोहे
सत्य सहाय सदा रहे, दो आशा-सहकार.
शांति-राज पुष्पा सके, सुषमा-कृष्ण निहार..
*
कीर्ति-किरण हनुमान की, दीप्ति इंद्र शशि सोम.
चन्द्र इंदु सत्य सुधा, माया-मुकुलित ॐ..
*
जब भी जीवन मिले कर सफल साधना हाथ.
सत-शिव सुंदर रचें पा, सत-चित-आनंद नाथ..
*
सत्य-यज्ञ में हो सके, जीवन समिधा दैव.
औरों का कुछ भलाकर, सार्थक बने सदैव..
*
कदम-कदम संघर्ष कर, सके लक्ष्य को जीत.
पूज्यपाद वर दीजिये, 'सलिल'-शत्रु हो मीत..
*
महाकाल से भी किये, बरसों दो-दो हाथ.
निज इच्छा से भू तजी, गह सुरपुर का पाथ..
*
लखी राम ने भी 'सलिल', कब आओ तुम, राह.
हमें दुखीकर तुम गये, पूरी करने चाह..
*
शिरोधार्य रह मौन हम, विधि का करें विधान.
दिल रोये, चुप हों नयन, अधर करें यश-गान..
*
सद्गुरु बिन सुर कर नहीं, पाये 'सलिल' निभाव.
बिन आवेदन चुन लिया, तुमको- मिटे अभाव..
*
देह जलाने ले गये, वे जिनसे था नेह.
जिन्हें दिखाया गेह था, करते वही-गेह..
*
आकुल-व्याकुल तन हुआ, मन है बहुत उदास.
सुरसरि को दीं अस्थियाँ, सुधियाँ अपने पास..
*
आदम की औकात है, बस मुट्ठी भर राख.
पार गगन को भी करे, तुम जैसों की साख..
*
नयन मूँदते ही दिखे, झलक तुम्हारी नित्य.
आँख खुले तो चतुर्दिक, मिलता जगत अनित्य..
*****
कविता:
विरसा
संजीव 'सलिल'
*
तुमने
विरसे में छोड़ी है
अकथ-कथा
संघर्ष-त्याग की.
हमने
जीवन-यात्रा देखी
जीवट-श्रम,
बलिदान-आग की.
आये थे अनजान बटोही
बहुतों के
श्रृद्धा भाजन हो.
शिक्षा, ज्ञान, कर्म को अर्पित
तुम सारस्वत नीराजन हो.
हम करते संकल्प
कर्म की यह मशाल
बुझ ना पायेगी.
मिली प्रेरणा
तुमसे जिसको
वह पीढ़ी जय-जय गायेगी.
प्राण-दीप जल दे उजियारा
जग ज्योतित कर
तिमिर हरेगा.
सत्य सहाय जिसे हो
वह भी-
तरह तुम्हारी लक्ष्य वरेगा.
*****
प्रो. सत्यसहाय के प्रति :
स्मृति गीत:
मन न मानता...
संजीव 'सलिल'
*
मन न मानता
चले गये हो...
*
अभी-अभी तो यहीं कहीं थे.
आँख खुली तो कहीं नहीं थे..
अंतर्मन कहता है खुदसे-
साँस-आस से
छले गये हो...
*
नेह-नर्मदा की धारा थे.
श्रम-संयम का जयकारा थे..
भावी पीढ़ी के नयनों में-
स्वप्न सदृश तुम
पले गये हो...
*
दुर्बल तन में स्वस्थ-सुदृढ़ मन.
तुम दृढ़ संकल्पों के गुंजन..
जीवन उपवन में भ्रमरों संग-
सूर्य अस्त लाख़
ढले गये हो...
*****

Thursday, September 9, 2010

कविता: जीवन अँगना को महकाया संजीव 'सलिल'

कविता:

जीवन अँगना को महकाया

संजीव 'सलिल'
*
*
जीवन अँगना को महकाया
श्वास-बेल पर खिली कली की
स्नेह-सुरभि ने.
कली हँसी तो फ़ैली खुशबू
स्वर्ग हुआ घर.
कली बने नन्हीं सी गुडिया.
ममता, वात्सल्य की पुडिया.
शुभ्र-नर्म गोला कपास का,
किरण पुंज सोनल उजास का.
उगे कली के हाथ-पैर फिर
उठी, बैठ, गिर, खड़ी हुई वह.
ठुमक-ठुमक छन-छननन-छनछन
अँगना बजी पैंजन प्यारी
दादी-नानी थीं बलिहारी.
*
कली उड़ी फुर्र... बनकर बुलबुल
पा मयूर-पंख हँस-झूमी.
कोमल पद, संकल्प ध्रुव सदृश
नील-गगन को देख मचलती
आभा नभ को नाप रही थी.
नवल पंखुडियाँ ऊगीं खाकी
मुद्रा-छवि थी अब की बाँकी.
थाम हाथ में बड़ी रायफल
कली निशाना साध रही थी.
छननन घुँघरू, धाँय निशाना
ता-ता-थैया, दायें-बायें
लास-हास, संकल्प-शौर्य भी
कली लिख रही नयी कहानी
बहे नर्मदा में ज्यों पानी.
बाधाओं की श्याम शिलाएँ
संगमरमरी शिला सफलता
कोशिश धुंआधार की धरा
संकल्पों का सुदृढ़ किनारा.
*
कली न रुकती,
कली न झुकती,
कली न थकती,
कली न चुकती.
गुप-चुप, गुप-चुप बहती जाती.
नित नव मंजिल गहती जाती.
कली हँसी पुष्पायी आशा.
सफल साधना, फलित प्रार्थना.
विनत वन्दना, अथक अर्चना.
नव निहारिका, तरुण तारिका.
कली नापती नील गगन को.
व्यस्त अनवरत लक्ष्य-चयन में.
माली-मलिन मौन मनायें
कोमल पग में चुभें न काँटें.
दैव सफलता उसको बाँटें.
पुष्पित हो, सुषमा जग देखे
अपनी किस्मत वह खुद लेखे.
******************************
टीप : बेटी तुहिना (हनी) का एन.सी.सी. थल सैनिक कैम्प में चयन होने पर रेल-यात्रा के मध्य १४.९.२००६ को हुई कविता.
------- दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

Sunday, August 15, 2010

स्वाधीनता दिवस पर विशेष रचना: गीत भारत माँ को नमन करें.... संजीव 'सलिल'

स्वाधीनता दिवस पर विशेष रचना:

गीत

भारत माँ को नमन करें....

संजीव 'सलिल'
*













*
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें.
ध्वजा तिरंगी मिल फहराएँ
इस धरती को चमन करें.....
*
नेह नर्मदा अवगाहन कर
राष्ट्र-देव का आवाहन कर
बलिदानी फागुन पावन कर
अरमानी सावन भावन कर

 राग-द्वेष को दूर हटायें
एक-नेक बन, अमन करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें......
*
अंतर में अब रहे न अंतर
एक्य कथा लिख दे मन्वन्तर
श्रम-ताबीज़, लगन का मन्तर
भेद मिटाने मारें मंतर

सद्भावों की करें साधना
सारे जग को स्वजन करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें......
*
काम करें निष्काम भाव से
श्रृद्धा-निष्ठा, प्रेम-चाव से
रुके न पग अवसर अभाव से
बैर-द्वेष तज दें स्वभाव से

'जन-गण-मन' गा नभ गुंजा दें
निर्मल पर्यावरण करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें......
*
जल-रक्षण कर पुण्य कमायें
पौध लगायें, वृक्ष बचायें
नदियाँ-झरने गान सुनायें
पंछी कलरव कर इठलायें

भवन-सेतु-पथ सुदृढ़ बनाकर
सबसे आगे वतन करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें......
*
शेष न अपना काम रखेंगे
साध्य न केवल दाम रखेंगे
मन-मन्दिर निष्काम रखेंगे
अपना नाम अनाम रखेंगे

सुख हो भू पर अधिक स्वर्ग से
'सलिल' समर्पित जतन करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें......
*******

Acharya Sanjiv Salil

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Tuesday, August 10, 2010

मुक्तिका ......... बात करें संजीव 'सलिल'

मुक्तिका

......... बात करें

संजीव 'सलिल'

*
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*

बात न मरने की अब होगी, जीने की हम बात करें.
हम जी ही लेंगे जी भरकर, अरि मरने की बात करें.

जो कहने की हो वह करने की भी परंपरा डालें.
बात भले बेबात करें पर मौन न हों कुछ बात करें..

नहीं सियासत हमको करनी, हमें न कोई चिंता है.
फर्क न कुछ, सुनिए मत सुनिए, केवल सच्ची बात करें..

मन से मन पहुँच सके जो, बस ऐसा ही गीत रचें.
कहें मुक्तिका मुक्त हृदय से, कुछ करने की बात करें..

बात निकलती हैं बातों से, बात बात तक जाती है.
बात-बात में बात बनायें, बात न करके बात करें..

मात-घात की बात न हो अब, जात-पांत की बात न हो.
रात मौन की बीत गयी है, तात प्रात की बात करें..

पतियाते तो डर जाते हैं, बतियाते जी जाते हैं.
'सलिल' बात से बात निकालें, मत मतलब की बात करें..
***************
Acharya Sanjiv Salil

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Saturday, July 24, 2010

चित्रगुप्त महिमा - आचार्य संजीव 'सलिल'

चित्रगुप्त महिमा - आचार्य संजीव 'सलिल'

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चित्र-चित्र में गुप्त जो, उसको विनत प्रणाम।
वह कण-कण में रम रहा, तृण-तृण उसका धाम ।

विधि-हरि-हर उसने रचे, देकर शक्ति अनंत।
वह अनादि-ओंकार है, ध्याते उसको संत।

कल-कल,छन-छन में वही, बसता अनहद नाद।
कोई न उसके पूर्व है, कोई न उसके बाद।

वही रमा गुंजार में, वही थाप, वह नाद।
निराकार साकार वह, नेह नर्मदा नाद।

'सलिल' साधना का वही, सिर्फ़ सहारा एक।
उस पर ही करता कृपा, काम करे जो नेक।

जो काया को मानते, परमब्रम्ह का अंश।
'सलिल' वही कायस्थ हैं, ब्रम्ह-अंश-अवतंश।

निराकार परब्रम्ह का, कोई नहीं है चित्र।
चित्र गुप्त पर मूर्ति हम, गढ़ते रीति विचित्र।

निराकार ने ही सृजे, हैं सारे आकार।
सभी मूर्तियाँ उसी की, भेद करे संसार।

'कायथ' सच को जानता, सब को पूजे नित्य।
भली-भाँति उसको विदित, है असत्य भी सत्य।

अक्षर को नित पूजता, रखे कलम भी साथ।
लड़ता है अज्ञान से, झुका ज्ञान को माथ।

जाति वर्ण भाषा जगह, धंधा लिंग विचार।
भेद-भाव तज सभी हैं, कायथ को स्वीकार।

भोजन में जल के सदृश, 'कायथ' रहता लुप्त।
सुप्त न होता किन्तु वह, चित्र रखे निज गुप्त।

चित्र गुप्त रखना 'सलिल', मन्त्र न जाना भूल।
नित अक्षर-आराधना, है कायथ का मूल।

मोह-द्वेष से दूर रह, काम करे निष्काम।
चित्र गुप्त को समर्पित, काम स्वयं बेनाम।

सकल सृष्टि कायस्थ है, सत्य न जाना भूल।
परमब्रम्ह ही हैं 'सलिल', सकल सृष्टि के मूल।

अंतर में अंतर न हो, सबसे हो एकात्म।
जो जीवन को जी सके, वह 'कायथ' विश्वात्म।
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Wednesday, April 21, 2010

क्षणिकाएँ... संजीव 'सलिल'

क्षणिकाएँ...
संजीव 'सलिल'
*
कर पाता दिल
अगर वंदना
तो न टूटता
यह तय है.
*
निंदा करना
बहुत सरल है.
समाधान ही
मुश्किल है.
*
असंतोष-कुंठा
कब उपजे?
बूझे कारण कौन?
'सलिल' सियासत
स्वार्थ साधती
जनगण रहता मौन.
*
मैं हूँ अदना
शब्द-सिपाही.
अर्थ सहित दें
शब्द गवाही..
*

Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

Saturday, April 10, 2010

राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चित्रांश संजीव वर्मा 'सलिल' ११-से १४ अप्रैल तक बिलासपुर छतीसगढ़ में हैं. वे सामाजिक एकता, चिट्ठाकारी  के विकास तथा साहित्यिक आयोजनों में सहभागिता करेंगे. इच्छुक जन निम्न पाते पर संपर्क करें: द्वारा: प्रो. सत्य सहाय, ७३ गायत्री मर्ग, विद्या नगर, बिलासपुर चलभाष: ०९४२५१८३२४४.

लिमटी खरे को 'संवाद सम्मान '

लिमटी खरे को 'संवाद सम्मान '
(शुक्रवार /09 अप्रैल 2010 / नई दिल्ली / मीडिया मंच )
 

चिट्ठाकारी सामाजिक चेतना को नए आयाम देने का कार्य अहर्निश कर रही है. सामाजिक चेतना के इस नए संसाधन का प्रभावी और लोकप्रिय उपयोग करना सबके बस का रोग नहीं है. इस दुकर कार्य को सहजता से करनेवालों में  पहना नाम है श्री लिमटी खरे का । खरे जी  की सक्रियता चिट्ठा  जगत में किसी से छिपी नहीं है। वे सामाजिक विषयों पर अपने धुंआधार लेखन के लिए जाने जाते हैं। पेशे से लिमटी जी एक स्वतंत्र पत्रकार हैं और अपने ब्लॉग 'रोजनामचा ' में दुनिया भर की खबरे लिया और दिया करते हैं। लेकिन इसके साथ ही साथ वे 'नुक्कड़ ',  'आमजन की खबरें ' और 'पहाड़ी की धूम ' आदि ब्लॉगों पर भी अपना सक्रिय योगदान करते रहते हैं। वे कायस्थ सभा के सक्रिय कार्यकर्ता भी रहे हैं । सम्वाद सम्मान मिलने पर हम सबकी ओर से उनका हार्दिक अभिनन्दन

Thursday, March 4, 2010

मुक्तक / चौपदे: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

मुक्तक / चौपदे

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
संजिव्सलिल.ब्लागस्पाट.कॉम / संजिव्सलिल.ब्लॉग.सीओ.इन
सलिल.संजीव@जीमेल.com
साहित्य की आराधना आनंद ही आनंद है.
काव्य-रस की साधना आनंद ही आनंद है.
'सलिल' सा बहते रहो, सच की शिला को फोड़कर.
रहे सुन्दर भावना आनंद ही आनंद है. 
****************************8
 ll नव शक संवत, आदिशक्ति का, करिए शत-शत वन्दन ll
 ll श्रम-सीकर का भारत भू को, करिए अर्पित चन्दन ll
 ll   नेह नर्मदा अवगाहन कर, सत-शिव-सुन्दर ध्यायें ll
 ll सत-चित-आनंद श्वास-श्वास जी, स्वर्ग धरा पर लायें ll
                              ****************
दिल को दिल ने जब पुकारा, दिल तड़प कर रह गया.
दिल को दिल का था सहारा, दिल न कुछ कह कह गया.
दिल ने दिल पर रखा पत्थर, दिल से आँखे फेर लीं-
दिल ने दिल से दिल लगाया, दिल्लगी दिल सह गया.
******************************************
कर न बेगाना मुझे तू, रुसवा ख़ुद हो जाएगा.
जिस्म में से जाँ गयी तो बाकी क्या रह जाएगा?
बन समंदर तभी तो दुनिया को कुछ दे पायेगा-
पत्थरों पर 'सलिल' गिरकर व्यर्थ ही बह जाएगा.
*******************************************
कौन किसी का है दुनिया में. आना-जाना खाली हाथ.
इस दरवाजे पर मय्यत है उस दरवाजे पर बारात.
सुख-दुःख धूप-छाँव दोनों में साज और सुर मौन न हो-
दिल से दिल तक जो जा पाये 'सलिल' वही सच्चे नगमात.

Monday, March 1, 2010

शुभकामनाएँ

भी को होली के हर्ष एवम उल्लास के पर्व  की हार्दिक शुभकामनाएँ

शुभकामनाए

होली कि शुभकामनाये

Saturday, February 20, 2010

'गोत्र' तथा 'अल्ल' acharya sanjiv 'salil'

'गोत्र' तथा 'अल्ल'

'गोत्र' तथा 'अल्ल' के अर्थ तथा महत्व संबंधी प्रश्न राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद् का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष होने के नाते मुझसे भी पूछे जाते हैं.

स्कन्दपुराण में वर्णित श्री चित्रगुप्त प्रसंग के अनुसार उनके बारह पत्रों को बारह ऋषियों के पास विविध विषयों की शिक्षा हेतु भेजा गया था. इन से ही कायस्थों की बारह उपजातियों का श्री गणेश हुआ. ऋषियों के नाम ही उनके शिष्यों के गोत्र हुए. इसी कारण विभिन्न जातियों में एक ही गोत्र मिलता है चूंकि ऋषि के पास विविध जाती के शिष्य अध्ययन करते थे. आज कल जिस तरह मॉडल स्कूल में पढ़े विद्यार्थी 'मोडेलियन' रोबेर्त्सों कोलेज में पढ़े विद्यार्थी 'रोबर्टसोनियन' आदि कहलाते हैं, वैसे ही ऋषियों के शिष्यों के गोत्र गुरु के नाम पर हुए. आश्रमों में शुचिता बनाये रखने के लिए सभी शिष्य आपस में गुरु भाई तथा गुरु बहिनें मानी जाती थीं. शिष्य गुरु के आत्मज (संततिवत) मान्य थे. अतः, उनमें आपस में विवाह वर्जित होना उचित ही था.

एक 'गोत्र' के अंतर्गत कई 'अल्ल' होती हैं. 'अल्ल' कूट शब्द (कोड) या पहचान चिन्ह है जो कुल के किसी प्रतापी पुरुष, मूल स्थान, आजीविका, विशेष योग्यता, मानद उपाधि या अन्य से सम्बंधित होता है. एक 'अल्ल' में विवाह सम्बन्ध सामान्यतया वर्जित मन जाता है किन्तु आजकल अधिकांश लोग अपने 'अल्ल' की जानकारी नहीं रखते. हमारा गोत्र 'कश्यप' है जो अधिकांश कायस्थों का है तथा उनमें आपस में विवाह सम्बन्ध होते हैं. हमारी अगर'' 'उमरे' है. मुझे इस अल्ल का अब तक केवल एक अन्य व्यक्ति मिला है. मेरे फूफा जी की अल्ल 'बैरकपुर के भले' है. उनके पूर्वज बैरकपुर से नागपुर जा बसे.

Tuesday, February 16, 2010

दुई घाटन के बीच

तीन दिनों के लिए संस्थान की ओर से महाकुम्भ की कवरेज के लिए हरिद्वार में था....दिन भर खबरें तलाशने के बाद जब सब सो रहे होते थे....मैं कुम्भ के तिलिस्म....देश की संस्कृति और जनजीवन के रहस्य टटोलने....या शायद खुद का भी वजूद तलाशने हरिद्वार की गलियों...घाटों....और नागाओं के साथ साथ आम आदमी के शिविरों को घूमा करता था.....ऐसे में ही एक दिन दो घाटों के बीच दोनो ओर देखते हुए कुछ सवाल उठे जो कविता बन गए......


देवापगा की

इस सतत प्रवाहमयी

प्रबल धारा के साथ

बह रहे हैं

पुष्प

बह रहे हैं

चमक बिखेरते दीप

स्नान कर

पापों से निवृत्त होने का

भ्रम पालते लोग

अगले घाट पर

उसी धारा में

बह रहे हैं

शव

प्रवाहित हैं अस्थियां

तट पर उठ रही हैं

चिताओं से ज्वाला

दोनों घाटों के बीच

रात के तीसरे पहर

मैं

बैठा हूं

सोचता हूं

क्या है आखिर

मार्ग निर्वाण का?

पहले घाट पर

जीवन के उत्सव में...

दूसरे घाट पर

मृत्यु के नीरव में....?

या फिर

इन दोनों के बीच

कहीं

जहां मैं बैठा हूं.....

मयंक सक्सेना -12-02-2010, हरिद्वार

Saturday, January 30, 2010

    
दैनिक जागरण, पटना १८-१-१०
Link-http://khabarkosi.blogspot.com
      -http://janshabd.blogspot.com
कुण्डलिनी


आचार्य संजीव 'सलिल'


*

करुणा संवेदन बिना, नहीं काव्य में तंत..

करुणा रस जिस ह्रदय में वह हो जाता संत.

वह हो जाता संत, न कोई पीर परायी.

आँसू सबके पोंछ, लगे सार्थकता पाई.

कंकर में शंकर दिखते, होता मन-मंथन.

'सलिल' व्यर्थ है गीत, बिना करुणा संवेदन.

***********************************

सदा समय पर जो करे, काम और आराम.

मिले सफलता उसी को., वह पाता धन-नाम.

वह पाता धन-नाम, न थक कर सो जाता है.

और नहीं पा हार, बाद में पछताता है.

कहे 'सलिल' कविराय, न खोना बच्चों अवसर.

आलस छोडो, करो काम सब सदा समय पर.

***********************************

कविता होती है 'सलिल', जब हो मन में पीर.

करे पीर को सहन तू, मन में धरकर धीर.

मन में धरकर धीर, सभी को हिम्मत दे तू.

तूफानों में डगमग नैया, अपनी खे तू.

विजयी वह जिसकी न कभी हिम्मत खोती है.

ज्यों की त्यों चादर हो तो कविता होती है.

***********************************

समय-समय की बात है समय-समय का फेर.

कभी देर होती भली, कभी देर अंधेर.

कभी देर अंधेर, हडबडी भी घातक है.

पुण्य हुआ जो आज, वही कल क्यों घातक है?

'सलिल' मात में जीत, जीत क्यों हुई मात है?

किसको दें क्यों दोष? समय की सिर्फ बात है.
 
***********************************

Thursday, January 28, 2010

विशेष आलेख: डॉ. महेंद्र भटनागर के गीतों में अलंकारिक सौंदर्य -आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

विशेष आलेख:

डॉ. महेंद्र भटनागर के गीतों में अलंकारिक सौंदर्य

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

जगवाणी हिंदी को माँ वीणापाणी के सितार के तारों से झंकृत विविध रागों से उद्भूत सांस्कृत छांदस विरासत से समृद्ध होने का अनूठा सौभाग्य मिला है. संस्कृत साहित्य की सरस विरासत को हिंदी ने न केवल आत्मसात किया अपितु पल्लवित-पुष्पित भी किया. हिंदी सहित्योद्यान के गीत-वृक्ष पर झूमते-झूलते सुन्दर-सुरभिमय अगणित पुष्पों में अपनी पृथक पहचान और ख्याति से संपन्न डॉ. महेंद्र भटनागर गत ७ दशकों से विविध विधाओं (गीत, कविता, क्षणिका, कहानी, नाटक, साक्षात्कार, रेखाचित्र, लघुकथा, एकांकी, वार्ता संस्मरण, गद्य काव्य, रेडियो फीचर, समालोचना, निबन्ध आदि में) समान दक्षता के साथ सतत सृजन कर बहु चर्चित हुए हैं. उनके गीतों में सर्वत्र व्याप्त आलंकारिक वैभव का पूर्ण निदर्शन एक लेख में संभव न होने पर भी हमारा प्रयास इसकी एक झलक से पाठकों को परिचित कराना है. नव रचनाकर्मी इस लेख में उद्धृत उदाहरणों के प्रकाश में आलंकारिक माधुर्य और उससे उपजी रमणीयता को आत्मसात कर अपने कविकर्म को सुरुचिसंपन्न तथा सशक्त बनाने की प्रेरणा ले सकें, तो यह प्रयास सफल होगा.

संस्कृत काव्यशास्त्र में काव्य समीक्षा के विभिन्न सम्प्रदायों (अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि, औचत्य, अनुमिति, रस) में से अलंकार, ध्वनि तथा रस को ही हिंदी गीति-काव्य ने आत्मार्पित कर नवजीवन दिया. असंस्कृत साहित्य में अलंकार को 'सौन्दर्यमलंकारः' ( अलंकार को काव्य का कारक), 'अलंकरोतीति अलंकारः' (काव्य सौंदर्य का पूरक) तथा अलंकार का मूल वक्रोक्ति को माना गया.

'सैषा सर्वत्र वक्रोक्तिरनयार्थो विभाच्याते.

यत्नोस्यां कविना कार्यः को लं कारो नया बिना..' २.८५ -भामह, काव्यालंकारः

डॉ. महेंद्र भटनागर के गीत-संसार में वक्रोक्ति-वृक्ष के विविध रूप-वृन्तों पर प्रस्फुटित-पुष्पित विविध अलंकार शोभायमान हैं. डॉ. महेंद्र भटनागर गीतों में स्वाभाविक भावाभिव्यक्ति के पोषक हैं. उनके गीतों में प्रयुक्त बिम्ब और प्रतीक सनातन भारतीय परंपरा से उद्भूत हैं जिन्हें सामान्य पाठक/श्रोता सहज ही आत्मसात कर लेता है. ऐसे पद सर्वत्र व्याप्त हैं जिनका उदाहरण देना नासमझी ही कहा जायेगा. ऐसे पद 'स्वभावोक्ति अलंकार' के अंतर्गत गण्य हैं.

शब्दालंकारों की छटा:

डॉ. महेंद्र भटनागर सामान्य शब्दों का विशिष्ट प्रयोग कर शब्द-ध्वनियों द्वारा पाठकों/श्रोताओं को मुग्ध करने में सिद्धहस्त हैं. वे वस्तु या तत्त्व को रूपायित कर संवेद्य बनाते हैं. शब्दालंकारों तथा अर्थालंकारों का यथास्थान प्रयोग गीतों के कथ्य को रमणीयता प्रदान करता है.

शब्दालंकारों के अंतर्गत आवृत्तिमूलक अलंकारों में अनुप्रास उन्हें सर्वाधिक प्रिय है.

'मैं तुम्हें अपना ह्रदय गा-गा बताऊँ, साथ छूटे यही कभी ना, हे नियति! करना दया, हे विधना! मोरे साजन का हियरा दूखे ना, आज आँखों में गया बस, प्रीत का सपना नया, निज बाहुओं में नेह से, लहकी-लहकी मधुर जवानी हो, नील नभ सर में मुदित-मुग्धा, तप्त तन को वारिदों सी छाँह दी आदि अगणित पंक्तियों में 'छेकानुप्रास' की छबीली छटा सहज दृष्टव्य है.

एक या अनेक वर्णों की अनेक आवृत्तियों से युक्त 'वृत्यानुप्रास' का सहज प्रयोग डॉ. महेंद्र जी के कवि-कर्म की कुशलता का साक्ष्य है. 'संसार सोने का सहज' (स की आवृत्ति), 'कन-कन की हर्षांत कहानी हो' ( क तथा ह की आवृत्ति), 'महकी मेरे आँगन में महकी' (म की आवृत्ति), 'इसके कोमल-कोमल किसलय' (क की आवृत्ति), 'गह-गह गहनों-गहनों गहकी!' (ग की आवृत्ति), 'चारों ओर झूमते झर-झर' (झ की आवृत्ति), 'मिथ्या मर्यादा का मद गढ़' (म की आवृत्ति) आदि इसके जीवंत उदाहरण हैं.

अपेक्षाकृत कम प्रयुक्त हुए श्रुत्यानुप्रास के दो उदाहरण देखिये- 'सारी रात सुध-बुध भूल नहाओ' (ब, भ) , काली-काली अब रात न हो, घन घोर तिमिर बरसात न हो' (क, घ) .

गीतों की काया को गढ़ने में 'अन्त्यानुप्रास' का चमत्कारिक प्रयोग किया है महेंद्र जी ने. दो उदाहरण देखिये- 'और हम निर्धन बने / वेदना कारण बने तथा 'बेसहारे प्राण को निज बाँह दी / तप्त तन को वारिदों सी छाँह दी / और जीने की नयी भर चाह दी' .

इन गीतों में 'भाव' को 'विचार' पर वरीयता प्राप्त है. अतः, 'लाटानुप्रास' कम ही मिलता है- 'उर में बरबस आसव री ढाल गयी होली / देखो अब तो अपनी यह चाल नयी हो ली.'

महेंद्र जी ने 'पुनरुक्तिप्रकाश' अलंकार के दोनों रूपों का अत्यंत कुशलता से प्रयोग किया है.

समानार्थी शब्दावृत्तिमय 'पुनरुक्तिप्रकाश' के उदाहरणों का रसास्वादन करें: 'कन-कन की हर्षांत कहानी हो, लहकी-लहकी मधुर जवानी हो, गह-गह गहनों-गहनों गहकी, इसके कोमल-कोमल किसलय, दलों डगमग-डगमग झूली, भोली-भोली गौरैया चहकी' आदि.

शब्द की भिन्नार्थक आवृत्तिमय पुनरुक्तिप्रकाश से उद्भूत 'यमक' अलंकार महेंद्र जी की रचनाओं को रम्य तथा बोधगम्य बनाता है: ' उर में बरबस आसव सी ढाल गयी होली / देखो अब तो अपनी यह चाल नयी होली' ( होली पर्व और हो चुकी), 'आँगन-आँगन दीप जलाओ (घर का आँगन, मन का आँगन).' आदि.

'श्लेष वक्रोक्ति' की छटा इन गीतों को अभिनव तथा अनुपम रूप-छटा से संपन्न कर मननीय बनाती है: 'चाँद मेरा खूब हँसता-मुस्कुराता है / खेलता है और फिर छिप दूर जाता है' ( चाँद = चन्द्रमा और प्रियतम), 'सितारों से सजी चादर बिछये चाँद सोता है'. काकु वक्रोक्ति के प्रयोग में सामान्यता तथा व्यंगार्थकता का समन्वय दृष्टव्य है: 'स्वर्ग से सुन्दर कहीं संसार है.'

चित्रमूलक अलंकार: हिंदी गीति काव्य के अतीत में २० वीं शताब्दी तक चित्र काव्यों तथा चित्रमूलक अलंकारों का प्रचुरता से प्रयोग हुआ किन्तु अब यह समाप्त हो चुका है. असम सामयिक रचनाकारों में अहमदाबाद के डॉ. किशोर काबरा ने महाकाव्य 'उत्तर भागवत' में महाकाल के पूजन-प्रसंग में चित्रमय पताका छंद अंकित किया है. डॉ. महेंद्र भटनागर के गीतों में लुप्तप्राय चित्रमूलक अलंकार यत्र-तत्र दृष्टव्य हैं किन्तु कवि ने उन्हें जाने-अनजाने अनदेखा किया है. बानगी देखें:

डॉ. महेंद्र भटनागर जी ने शब्दालंकारों के साथ-साथ अर्थालंकारों का प्रयोग भी समान दक्षता तथा प्रचुरता से किया है. छंद मुक्ति के दुष्प्रयासों से सर्वथा अप्रभावित रहते हुए भी उनहोंने न केवल छंद की साधना की अपितु उसे नए शिखर तक पहुँचाने का भागीरथ प्रयास किया.

प्रस्तुत-अप्रस्तुत के मध्य गुण- सादृश्य प्रतिपादित करते 'उपमा अलंकार' को वे पूरी सहजता से अंगीकार कर सके हैं. 'दिग्वधू सा ही किया होगा, किसी ने कुंकुमी श्रृंगार / झलमलाया सोम सा होगा किसी का रे रुपहला प्यार, बिजुरी सी चमक गयीं तुम / श्रुति-स्वर सी गमक गयीं तुम / दामन सी झमक गयीं तुम / अलबेली छमक गयीं तुम / दीपक सी दमक गयीं तुम, कौन तुम अरुणिम उषा सी मन-गगन पर छ गयी हो? / कौन तुम मधुमास सी अमराइयाँ महका गयी हो? / कौन तुम नभ अप्सरा सी इस तरह बहका गयी हो? / कौन तुम अवदात री! इतनी अधिक जो भा गयी हो? आदि-आदि.

रूपक अलंकार उपमेय और उपमान को अभिन्न मानते हुए उपमेय में उपमान का आरोप कर अपनी दिव्या छटा से पाठक / श्रोता का मन मोहता है. डॉ. महेंद्र भटनागर के गीतों में 'हो गया अनजान चंचल मन हिरन, झम-झमाकर नाच ले मन मोर, आस सूरज दूर बेहद दूर है, गाओ कि जीवन गीत बन जाये, गाओ पराजय जीत बन जाये, गाओ कि दुःख संगीत बन जाये, गाओ कि कण-कण मीत बन जाये, अंधियारे जीवन-नभ में बिजुरी सी चमक गयीं तुम, मुस्कुराये तुम ह्रदय-अरविन्द मेरा खिल गया है आदि में रूपक कि अद्भुत छटा दृष्टव्य है.'नभ-गंगा में दीप बहाओ, गहने रवि-शशि हों, गजरे फूल-सितारे, ऊसर-मन, रस-सागा, चन्द्र मुख, मन जल भरा मिलन पनघट, जीवन-जलधि, जीवन-पिपासा, जीवन बीन जैसे प्रयोग पाठक /श्रोता के मानस-चक्षुओं के समक्ष जिवंत बिम्ब उपस्थित करने में सक्षम है.

डॉ. महेंद्र भटनागर ने अतिशयोक्ति अलंकार का भी सरस प्रयोग सफलतापूर्वक किया है. एक उदाहरण देखें: 'प्रिय-रूप जल-हीन, अँखियाँ बनीं मीन, पर निमिष में लो अभी / अभिनव कला से फिर कभी दुल्हन सजाता हूँ, एक पल में लो अभी / जगमग नए अलोक के दीपक जलाता हूँ, कुछ क्षणों में लो अभी.'

डॉ. महेंद्र भटनागर के गीतों में अन्योक्ति अलंकार भी बहुत सहजता से प्रयुक्त हुआ है. किसी एक वस्तु या व्यक्ति को लक्ष्य कर कही बात किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति पर घटित हो तो अन्योक्ति अलंकार होता है. इसमें प्रतीक रूप में बात कही जाती है जिसका भिन्नार्थ अभिप्रेत होता है. बानगी देखिये: 'सृष्टि सारी सो गयी है / भूमि लोरी गा रही है, तुम नहीं और अगहन की रात / आज मेरे मौन बुझते दीप में प्रिय / स्नेह भर दो / अब नहीं मेरे गगन पर चाँद निकलेगा.

कारण के बिना कार्य होने पर विशेषोक्ति अलंकार होता है. इन गीतों में इस अलंकार की व्याप्ति यत्र-तत्र दृष्टव्य है: 'जीवन की हर सुबह सुहानी हो, हर कदम पर आदमी मजबूर है आदि में कारन की अनुपस्थिति से विशेषोक्ति आभासित होता है.

'तुम्हारे पास मानो रूप का आगार है' में उपमेय में उपमान की सम्भावना व्यक्त की गयी है. यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है जिसका अपेक्षाकृत कम प्रयोग इन गीतों में मिला.

डॉ. महेंद्र भटनागर रूपक तथा उपमा के धनी गीतकार हैं. सम्यक बिम्बविधान, तथा मौलिक प्रतीक-चयन में उनकी असाधारण दक्षता ने उन्हें अछूते उपमानों की कमी नहीं होने दी है. फलतः, वे उपमेय को उपमान प्रायः नहीं कहते. इस कारन उनके गीतों में व्याजस्तुति, व्याजनिंदा, विभावना, व्यतिरेक, भ्रांतिमान, संदेह, विरोधाभास, अपन्हुति, प्रतीप, अनन्वय आदि अलंकारों की उपस्थति नगण्य है.

'चाँद मेरे! क्यों उठाया / जीवन जलधि में ज्वार रे?, कौन तुम अरुणिम उषा सी, मन गगन पर छा गयी हो?, नील नभ सर में मुदित-मुग्धा उषा रानी नहाती है, जूही मेरे आँगन में महकी आदि में मानवीकरण अलंकर की सहज व्याप्ति पाठक / श्रोता को प्रकृति से तादात्म्य बैठालने में सहायक होती है.

स्मरण अलंकार का प्रचुर प्रयोग डॉ. महेंद्र भटनागर ने अपने गीतों में पूर्ण कौशल के साथ किया है. चिर उदासी भग्न निर्धन, खो तरंगों को ह्रदय / अब नहीं जीवन जलधि में ज्वार मचलेगा, याद रह-रह आ रही है / रात बीती जा रही है, सों चंपा सी तुम्हारी याद साँसों में समाई है, सोने न देती छवि झलमलाती किसी की आदि अभिव्यक्तियों में स्मरण अलंकार की गरिमामयी उपस्थिति मन मोहती है.

तत्सम-तद्भव शब्द-भ्नादर के धनि डॉ. महेंद्र भटनागर एक वर्ण्य का अनेक विधि वर्णन करने में निपुण हैं. इस कारन गीतों में उल्लेख अलंकार की छटा निहित होना स्वाभाविक है. यथा: कौन तुम अरुणिम उषा सी?, मधु मॉस सी, नभ आभा सी, अवदात री?, बिजुरी सी, श्रुति-स्वर सी, दीपक सी / स्वागत पुत्री- जूही, गौरैया, स्वर्गिक धन आदि.

सच यह है कि डॉ. भटनागर के सृजन का फलक इतना व्यापक है कि उसके किसी एक पक्ष के अनुशीलन के लिए जिस गहन शोधवृत्ति की आवश्यकता है उसका शतांश भी मुझमें नहीं है. यह असंदिग्ध है की डॉ. महेंद्र भटनागर इस युग की कालजयी साहित्यिक विभूति हैं जिनका सम्यक और समुचित मूल्यांकन किया जाना चाहिए और उनके सृजन पर अधिकतम शोध कार्य उनके रहते ही हों तो उनकी रचनाओं के विश्लेषण में वे स्वयं भी सहायक होंगे. डॉ. महेंद्र भटनागर की लेखनी और उन्हें दोनों को शतशः नमन.

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सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम / दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.com

अनुज कुमार

अनुज कुमार जी कौन है अपना परिचय दें

Monday, January 25, 2010

गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत:



सारा का सारा हिंदी है


आचार्य संजीव 'सलिल'

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जो कुछ भी इस देश में है, सारा का सारा हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....

मणिपुरी, कथकली, भरतनाट्यम, कुचपुडी, गरबा अपना है.

लेजिम, भंगड़ा, राई, डांडिया हर नूपुर का सपना है.

गंगा, यमुना, कावेरी, नर्मदा, चनाब, सोन, चम्बल,

ब्रम्हपुत्र, झेलम, रावी अठखेली करती हैं प्रति पल.

लहर-लहर जयगान गुंजाये, हिंद में है और हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....



मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजा सबमें प्रभु एक समान.

प्यार लुटाओ जितना, उतना पाओ औरों से सम्मान.

स्नेह-सलिल में नित्य नहाकर, निर्माणों के दीप जलाकर.

बाधा, संकट, संघर्षों को गले लगाओ नित मुस्काकर.

पवन, वन्हि, जल, थल, नभ पावन, कण-कण तीरथ, हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....


जै-जैवन्ती, भीमपलासी, मालकौंस, ठुमरी, गांधार.

गजल, गीत, कविता, छंदों से छलक रहा है प्यार अपार.

अरावली, सतपुडा, हिमालय, मैकल, विन्ध्य, उत्तुंग शिखर.

ठहरे-ठहरे गाँव हमारे, आपाधापी लिए शहर.

कुटी, महल, अँगना, चौबारा, हर घर-द्वारा हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....



सरसों, मका, बाजरा, चाँवल, गेहूँ, अरहर, मूँग, चना.

झुका किसी का मस्तक नीचे, 'सलिल' किसी का शीश तना.

कीर्तन, प्रेयर, सबद, प्रार्थना, बाईबिल, गीता, ग्रंथ, कुरान.

गौतम, गाँधी, नानक, अकबर, महावीर, शिव, राम महान.

रास कृष्ण का, तांडव शिव का, लास्य-हास्य सब हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....


ट्राम्बे, भाखरा, भेल, भिलाई, हरिकोटा, पोकरण रतन.

आर्यभट्ट, एपल, रोहिणी के पीछे अगणित छिपे जतन.

शिवा, प्रताप, सुभाष, भगत, रैदास कबीरा, मीरा, सूर.

तुलसी. चिश्ती, नामदेव, रामानुज लाये खुदाई नूर.

रमण, रवींद्र, विनोबा, नेहरु, जयप्रकाश भी हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....

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Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com/

Friday, January 22, 2010

ग़ज़ल --बहुत हैं मन में लेकिन --संजीव 'सलिल'

ग़ज़ल


संजीव 'सलिल'


बहुत हैं मन में लेकिन फिर भी कम अरमान हैं प्यारे.

पुरोहित हौसले हैं मंजिलें जजमान हैं प्यारे..



लिये हम आरसी को आरसी में आरसी देखें.

हमें यह लग रहा है खुद से ही अनजान हैं प्यारे..



तुम्हारे नेह के नाते न कोई तोड़ पायेगा.

दिले-नादां को लगते हिटलरी फरमान हैं प्यारे..



छुरों ने पीठ को घायल किया जब भी तभी देखा-

'सलिल' पर दोस्तों के अनगिनत अहसान हैं प्यारे..



जो दाना होने का दावा रहा करता हमेशा से.

'सलिल' से ज्यादा कोई भी नहीं नादान है प्यारे..



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Wednesday, January 20, 2010

बासंती दोहा ग़ज़ल -संजीव 'सलिल'

बासंती दोहा ग़ज़ल



संजीव 'सलिल'


स्वागत में ऋतुराज के, पुष्पित हैं कचनार.

किंशुक कुसुम विहंस रहे या दहके अंगार..


पर्ण-पर्ण पर छा गया, मादक रूप निखार.

पवन खो रहा होश है, लख वनश्री श्रृंगार..


महुआ महका देखकर, बहका-चहका प्यार.

मधुशाला में बिन पिए' सर पर नशा सवार..


नहीं निशाना चूकती, पञ्च शरों की मार.

पनघट-पनघट हो रहा, इंगित का व्यापार..


नैन मिले लड़ झुक उठे, करने को इंकार.

देख नैन में बिम्ब निज, कर बैठे इकरार..


मैं तुम यह वह ही नहीं, बौराया संसार.

ऋतु बसंत में मन करे, मिल में गले, खुमार..


ढोलक टिमकी मंजीरा, करें ठुमक इसरार.

तकरारों को भूलकर, नाचो गाओ यार..


घर आँगन तन धो लिया, सचमुच रूप निखार.

अपने मन का मेल भी, हँसकर 'सलिल' बुहार..


बासंती दोहा ग़ज़ल, मन्मथ की मनुहार.

सूरत-सीरत रख 'सलिल', निएमल-विमल सँवार..


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दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

Tuesday, January 19, 2010

मुक्तिका:: खुशबू संजीव 'सलिल'

मुक्तिका




खुशबू



संजीव 'सलिल'



कहीं है प्यार की खुशबू, कहीं तकरार की खुशबू..

कभी इंकार की खुशबू, कभी इकरार की खुशबू..



सभी खुशबू के दीवाने हुए, पीछे रहूँ क्यों मैं?

मुझे तो भा रही है यार के दीदार की खुशबू..



सभी कहते न लेकिन चाहता मैं ठीक हो जाऊँ.

उन्हें अच्छी लगे है दिल के इस बीमार की खुशबू.



तितलियाँ फूल पर झूमीं, भ्रमर यह देखकर बोला.

कभी मुझको भी लेने दो दिले-गुलज़ार की खुशबू.



'सलिल' थम-रुक न झुक-चुक, हौसला रख हार को ले जीत.

रहे हर गीत में मन-मीत के सिंगार की खुशबू..



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Friday, January 15, 2010

नर्मदा नामावली नर्मदा नामावली

नर्मदा नामावली


नर्मदा नामावली


पुण्यतोया सदानीरा नर्मदा.

शैलजा गिरिजा अनिंद्या वर्मदा.

शैलपुत्री सोमतनया निर्मला.

अमरकंटी शांकरी शुभ शर्मदा.

आदिकन्या चिरकुमारी पावनी.

जलधिगामिनी चित्रकूटा पद्मजा.

विमलहृदया क्षमादात्री कौतुकी.

कमलनयनी जगज्जननि हर्म्यदा.

शाशिसुता रौद्रा विनोदिनी नीरजा.

मक्रवाहिनी ह्लादिनी सौंदर्यदा.

शारदा वरदा सुफलदा अन्नदा.

नेत्रवर्धिनि पापहारिणी धर्मदा.

सिन्धु सीता गौतमी सोमात्मजा.

रूपदा सौदामिनी सुख-सौख्यदा.

शिखरिणी नेत्रा तरंगिणी मेखला.

नीलवासिनी दिव्यरूपा कर्मदा.

बालुकावाहिनी दशार्णा रंजना.

विपाशा मन्दाकिनी चित्रोंत्पला.

रुद्रदेहा अनुसूया पय-अंबुजा.

सप्तगंगा समीरा जय-विजयदा.

अमृता कलकल निनादिनी निर्भरा.

शाम्भवी सोमोद्भवा स्वेदोद्भवा.

चन्दना शिव-आत्मजा सागर-प्रिया.

वायुवाहिनी कामिनी आनंददा.

मुरदला मुरला त्रिकूटा अंजना.

नंदना नाम्माडिअस भव मुक्तिदा.

शैलकन्या शैलजायी सुरूपा.

विपथगा विदशा सुकन्या भूषिता.

गतिमयी क्षिप्रा शिवा मेकलसुता.

मतिमयी मन्मथजयी लावण्यदा.

रतिमयी उन्मादिनी वैराग्यदा.

यतिमयी भवत्यागिनी शिववीर्यदा.

दिव्यरूपा तारिणी भयहांरिणी.

महार्णवा कमला निशंका मोक्षदा.

अम्ब रेवा करभ कालिंदी शुभा.

कृपा तमसा शिवज सुरसा मर्मदा.

तारिणी वरदायिनी नीलोत्पला.

क्षमा यमुना मेकला यश-कीर्तिदा.

साधना संजीवनी सुख-शांतिदा.

सलिल-इष्ट माँ भवानी नरमदा.


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Tuesday, January 12, 2010

वदीZ वाले गुण्डा!

वदीZ वाले गुण्डा!

वदीZ पर तमगे नहीं टंगे हैं दाग

(लिमटी खरे)


आजाद हिन्दुस्तान में देश की जनता अमन चैन से गुजर बसर कर सके इसलिए हर साल सैकडों पुलिस के जवान अपने प्राणों की आहूति दिया करते हैं। पुलिसकर्मियों के इस बलिदान के चलते लोगों की नजरों में पुलिस की छवि उजली उजली नजर आती है। पुलिस पर लोगों का भरोसा इसी के चलते कायम हो पाता है। विडम्बना यह है कि इन्हीं के बीच कुछ भेडिए भी खाकी पहन कर लोगों के मन में खाकी के प्रति रोष और असंतोष भर देते हैं।

सालों पहले एक ख्यातिलब्ध लेखक की नावेल ``वदीZ वाला गुण्डा`` पढी थी। उस वक्त पुलिस में इस तरह के खाकी गुण्डों की तादाद इक्का दुक्का हुआ करती थी। आज के समय में पुलिस में वदीZ वाले गुण्डों की खासी तादाद हो गई है, जो रियाया का अमन चैन लूट रहे हैं। इतना सब होने के बाद भी अमन चैन से लोगों को रहने देने का दावा करने वाले हाकिमों के कानों में जूं तक नहीं रेंगती है। देश के शासक जनता को महफूज रखने के बजाए इन बर्बर पुलिसियों के दागदार सीने पर मेडल पर मेडल लटकाए जा रहे हैं।

राष्ट्रपति का उत्कृष्ट सेवा पदक उन पुलिसियों को दिया जाता है जो 15 साल की सेवा बेदाग पूरी कर चुके हों और उनका सालाना गोपनीय प्रतिवेदन (एसीआर) आउट स्टेंडिंग श्रेणी का हो। इसके अलावा उस पर कोई आपराधिक प्रकरण न चल रहा हो, एवं पुलिस प्रमुख की संस्तुति भी इसके साथ होना जरूरी है। इस तरह के प्रकरण को राज्य सरकार द्वारा केंद्रीय गृह विभाग को भेज दिया जाता है।

जहां चयन समिति द्वारा इन नामों पर विचार कर उन श्रेष्ठ अधिकारियों का चयन करती है जो वाकई इस पदक के हकदार हों। यह समिति अपनी अनुशंसा के बाद इसे दूसरी समिति को नाम के साथ प्रतिवेदन भेजती है, जहां एक बार फिर स्क्रीनिंग के उपरांत नामों को चुन कर उसे गृह सचिव के माध्यम से राष्ट्रपति सचिवालय को भेज दिया जाता है। महामहिम राष्ट्रपति की मंजूरी के उपरांत गणतंत्र या स्वाधीनता दिवस पर इन पदकों की घोषणा की जाती है।


हाल ही में रूचिका के मामले में चर्चा में आए 1965 बेच के हरियाणा काडर के पुलिस अधिकारी शंभू प्रसाद सिंह राठौर को एसा ही पदक मिला था। अब सवाल यह उठता है कि इस तरह के निष्ठुर और अमानवीय सोच रखने वाले अधिकारी को पदक देने के लिए उसके नाम पर विचार के लिए इतनी सीिढयां लांघी गई हों, फिर भी कोई इस दागी अफसर को पहचान न पाया हो यह बात आसानी से गले नहीं उतरती। दरअसल दोष भारतीय व्यवस्था में ही है।

राठौर अकेले नहीं हैं, जिन्होने वदीZ के रौब के चलते मनमानी की हो। देश का पुलिस महकमा राठौरों से अटा पडा है। पुलिस के डंडे के आगे किसी की नहीं चलती। हरियाणा काडर के ही 76 बेच के आईपीएस अधिकारी और सूबे में जेल प्रशासन के महानिदेश रहे रविकांत शर्मा इन दिनों तिहाड जेल में सजा काट रहे हैं, उन पर पत्रकार शिवानी भटनागर की हत्या का ताना बाना बुनने के लिए प्रमुख दोषी करार दिया गया है।


87 बेच के गुजरात काडर के अधिकारी डीजी बंजारा को शेहराबुद्दीन शेख को लश्कर ए तैयबा का आतंकवादी मानकर फर्जी एनकाउंटर करने का आरोप है। फिलहाल ये हिरासत में हैं और इन पर मुकदमा दायर है। महाराष्ट्र काडर के क्राईम बांच के उपयुक्त बीएन साल्वे एसे अधिकारी हैं जो एक माफिया डान की क्रिसमस पार्टी में ठुमके लगाते दिखे थे। इन्हें निलंबित किया गया है।

यहीं के 71 बेच के अधिकारी एस.एस.विर्क को पुलिस महानिदेशक रहते हुए ही गिरफ्तार किया गया था। विर्क की गिरफ्तारी देश में अपनी तरह की पहली मिसाल थी कि मुखिया पद पर रहते किसी को पकडा गया हो। इन पर पद का दुरूपयोग का संगीन आरोप था। इतना ही नहीं देश की रक्षा करने वाले कांधों पर मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप भी लगते रहे हैं। 95 बेच के जम्मू काश्मीर काडर के अधिकारी शाजी मोहन का हाल कुछ यही बयां करता है। मोहन को चंडीगढ में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो में जोनल डारेक्टर बनाया गया था। पिछले साल जनवरी में वे मुंबई में आतंकवाद निरोधक बल के हाथों हेरोईन के साथ पकडे गए थे।

पुलिस के डर से उसकी पकड से आम अपराधी फरारी काटते हैं। पर यहां तो भारतीय पुलिस सेवा के अफसर ही फरारी काट रहे हैं। 97 बेच के राजस्थान काडर के आईपीएस अधिकारी मधुकर टंडन पर आरोप है कि उन्होंने राजस्थान पुलिस महानिदेशक रहते हुए दौसा जिले की एक आदिसावी महिला का अपहरण कर उसके साथ नोएडा में बलात्कार किया। फिलहाल टंडन पिछले 13 सालों से फरार हैं।


झारखण्ड के 75 बेच के अधिकारी पी.एस.नटराजन को पांच साल पहले एक स्टिंग आपरेशन में पकडा गया था। नटराजन पर आरोप है कि उन्होंने भी एक आदिवासी महिला के साथ मुंह काला किया है। फिलहाल नटराजन फरार ही हैं। यूटी काडर के 77 बेच के अधिकारी आर.के.शर्मा की कहनी भी दिलचस्प है। 2002 में उन्हें घर में काम करने वाली एक बाई के साथ बलात्कार करने के आरोप में पकडा गया था, वे फिलहाल अपनी सजा काट रहे हैं।

हरियाणा राज्य दागी अधिकारियों से अटा पडा है। एसपीएस राठौर, रविकांत शर्मा के साथ ही साथ यहां 77 बेच के अधिकारी और राज्य के पुलिस महानिरीक्षक रहे हरीश कुमार को पुलिस ने धोखाधडी के आरोप में पकडा था, वे तिहाड जेल में सजा काट रहे हैं। हिमाचल प्रदेश के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक बी.एस.थींड 74 बेच के आईपीएस हैं। इन पर एक व्यवसायी अशोक मित्तल से जबरिया वसूली का आरोप है। गिल भी पीछे नहीं हैं, उन पर एक महिला अधिकारी से छेडछाड का संगीन आरोप है।

दागदार वदीZ के एक नहीं अनेको उदहारण मौजूद हैं देश के हर राज्य में। आश्चर्य तो तब होता है, जब इस तरह के दागी अधिकारी अपने सीने पर वदीZ को गौरवािन्वत करने वाले मेडल पहनने का दुस्साहस कैसे कर पाते हैं। क्या इनकी अंतरात्मा इन्हें कुछ नहीं कहती।

पुलिस के चंद अधिकारियों के इस तरह निरंकुश होने के पीछे सबसे बडी वजह यह है कि इन्हें जनसेवकों का खासा प्रश्रय प्राप्त हो जाता है। राजनीति, पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के घोंटे में अगर मीडिया का तडका भी लग जाए तो राठौर जैसी शिक्सयतों का उदय होता है, जो रूचिका जैसी निरीह बाला को आत्महत्या के लिए प्रेरित करते हैं।

मीडिया भले ही सालों बाद रूचिका मामले को उजागर करने के लिए अपनी पीठ थपथपा रही हो पर मीडिया तब कहां था जब यह घटना घटी थी। कहने का तातपर्य महज इतना ही है कि मीडिया को प्रजातंत्र का चौथा खम्बा माना गया है, और मीडिया आज के समय में कार्पोरेट बजार में तब्दील हो गया है। यही कारण है कि वदीZ वाले गुण्डों के हौसले बुलंद होते जा रहे हैं, तथा रूचिकाओं की आत्महत्याओं के प्रकरणों में हो रही है बढोत्तरी।


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Monday, January 11, 2010

बाबूराज में दम घुटता विज्ञान का


बाबूराज में दम घुटता विज्ञान का


(लिमटी खरे)

देश के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह की चिंता बेमानी नहीं कही जा सकती है, जिसमें उन्होंने कहा है कि विज्ञान के लिए बाधा न बने नौकरशाही। प्रधानमंत्री ने काफी सोच समझकर यह वक्तव्य दिया है। अपने लगभग साढे छ: साल के प्रधानमंत्रित्व काल में मनमोहन सिंह भली भांति समझ चुके होंगे कि भारत गणराज्य की व्यवस्थाओं में बाबूराज और नौकरशाही की लाल फीताशाही की जडें किस कदर मजबूत हो चुकी हैं। वैसे देखा जाए तो प्रधानमंत्री ने यह बात करकर भारतीय मूल के नोबेल पुरूस्कार विजेता वेंकटरमन रामकृष्णन की बात को ही दुहराया है।


सवाल यह उठता है कि क्या प्रधानमंत्री की अपील का कोई असर होगा। एक जमाना था जब प्रधानमंत्री या देश के महामहिम राष्ट्रपति के आव्हान का आम जनता पर जबर्दस्त असर होता था। चाहे स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री देश को संबोधित कर रहे हों अथवा गणतंत्र या स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर महामहिम राष्ट्रपति का देश के नाम संबोधन हो, देशवासी आकाशवाणी या दूरदर्शन पर इसे पूरे ध्यान से सुना करते थे। देश के आला नेताओं के देश निर्माण के सपने को आम जनता अंगीकार कर सुनहरा भविष्य गढने का ताना बाना बुना करती थी। आज समय पूरी तरह बदल चुका है। अब बडे नेताओं की अपील में भी राजनीति की बू आती है।

97वी भारतीय विज्ञान कांग्रेस (आईसीएस) के उद्धाटन पर प्रधानमंत्री डॉ.एम.एम.सिंह ने विज्ञान पर नौकरशाहों की बाधा बनने की प्रवृत्ति को दुर्भाग्यपूर्ण ही बताया है। देश में प्रतिभा के विकास के लिए विदेशों में काम कर रहे भारतीय वैज्ञानिकों को स्वदेश लौटने का आव्हान भी किया है वजीरे आजम ने। पीएम ने कहा है कि कंसोलिउेशन ऑफ यूनिवर्सिटी रिसर्च और इनोवेशन एंड एक्सीलेंस को इसलिए आरंभ किया गया है ताकि अधिक से अधिक महिलाएं विज्ञान के क्षेत्र में अपना सुनहरा भविष्य बनाने के लिए आकषिZत हो सकें। निश्चित तौर पर वजीरे आला ने एक बहुत ही निहायत सामयिक मुद्दे की ओर ध्यान आकषिZत किया है। विडम्बना यह है कि नौकरशाही के मकडजाल से इसे मुक्त कराने की बात खुद सरकार के मुखिया के श्रीमुख से निकल रही है।


यक्ष प्रश्न आज भी वही खडा हुआ है कि देश विज्ञान की स्थिति क्या है। अस्सी के दशक के आरंभ के साथ ही युवाओं में विज्ञान के बजाए प्रोद्योगिकी की ओर रूझान बढता चला गया। यही कारण है कि देश में विज्ञान पिछड गया है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जबकि स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव ने अपने रेल मंत्री के कार्यकाल में भारतीय रेल के स्टेशनों को गंदगी से मुक्त कराने के लिए खडी रेल गाडी में शौच न करने की समस्या उठाई थी।

लालू की इस समस्या का निदान चैन्नई की एक बारह साल की बाला माशा नजीम ने चुटकी में खोज दिया था। आठवीं दर्ज में पढने वाली माशा के अनुसार रेल्वे स्टेशन आते ही जलमल निकासी का पाईप एक रेल में जुडे एक संग्रहण टेंक से स्वत: ही जुड जाएंगे। बाद में रेल्वे स्टेशन के गुजरने के बाद खुले स्थान में यह मलबा चालक द्वारा कहीं गिरा दिया जाएगा। तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति कलाम ने भी इस तकनीक को सराहा था।

एसा नहीं कि देश में तेज दिमाग बच्चों की कमी हो। दरअसल हिन्दुस्तान की शिक्षा पद्यति व्यवहारिक ज्ञान की ओर ध्यान देने वाली नहीं है। आमिर खान अभिनीत ``थ्री ईडियट्स`` चलचित्र कमोबेश इसी पर केंद्रित है। एक पुराने वाक्ये का जिकर यहां प्रासंगिक होग। मध्य प्रदेश की सीमा से लगे महाराष्ट्र के कामठी नागपुर मार्ग पर एक ओव्हलोड ट्रक रेल्वे के अंडरपास में फंस गया। इसे निकालने काफी जुगत लगाई गई। मोटी पगार पाने वाले इंजीनियर्स ने भी हाथ डाल दिए।

मामला चूंकि देश के सबसे लंबे और व्यस्ततम राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात का था सो लगातार यातायात बाधित होने पर कोहराम मच गया। अंतत: सभी पहलुओं पर गौर फरमाने के बाद आला इंजीनियर्स ने रेल्वे के पुल को उपर से तोडकर लारी को बाहर निकालने पर सहमति जताई। यह मामला काफी खर्चीला था, एवं इससे नागपुर से बरास्ता रायपुर पूर्वी भारत का संपर्क रेल से लंबे समय के लिए अवरूद्ध होने की आशंका भी थीं


तभी वहां से एक चरवाहा गुजरा जिसने मामले की नजाकत को देखकर एसा तरीका बताया कि विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी के स्नातक इंजीनियर्स का सर चकरा गया। उसने फंसे ट्रक के सभी पहियों की हवा निकालने का सुझाव दिया और कहा कि इससे लारी छ: इंच नीचे आ जाएगी फिर आसानी से उसे खींचा जा सकेगा। इसके बाद से रेल्वे अंडरपास के दोनों सिरों पर लोहे के बेरियर का इस्तेमाल किया जाने लगा।

कहने का तातपर्य महज इतना सा है कि पूर्वी और पश्चिमी दोनों ही देश भारत के दिमाग की दाद देते हैं किन्तु उचित मार्गदर्शन के अभाव में युवाओं का पथभ्रष्ट होना स्वाभाविक ही है। युवा पीढी में आज विज्ञान के बजाए प्रोद्योगिकी की ओर रूझान साफ दिखता है। युवाओं के लिए आज भी इंजीनियर की उपाधि का ग्लेमर बरकरार है। कंप्यूटर के युग में इंफरमेशन तकनालाजी (आईटी) इनकी पसंद बन गई है।

तेजी से बदलते युग में सरकारी और गैरसरकारी क्षेत्रों में विज्ञान से संबंधित विषयों पर रोजगार के अवसर नगण्य हो गए हैं। अससी के दशक में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साईंस कम्युनिकेशन एण्ड इंफरमेशन रिसोZसेज की पत्रिका ``विज्ञान प्रगति`` स्कूलों में खासी लोकप्रिय हुई थी। महज सत्तर पैसे (लगभग बारह आने) में आने वाली इस पत्रिका से विद्यार्थियों को विज्ञान के बारे में रोचक जानकारियां मिला करती थीं।

विडम्बना ही कही जाएगी कि आज इंजीनियरिंग की उपाधि हासिल करने वो पचास फीसदी से अधिक विद्यार्थी अपने मूल काम से इतर अन्य रोजगार ढूंढने पर मजबूर हैं। भारतीय प्रशासिनक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा में ही देखा जाए तो इंजीनियर स्नातकों की बाढ सी आई हुई है। इस बारे में 1985 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री कृष्ण चंद पंत का एक वक्तव्य का जिकर लाजिमी होगा जिसमें उन्होंने कहा था कि हिन्दुस्तान में इंजीनियर की डिग्री धारण करने वाले पचास फीसदी छात्रों द्वारा एसे कामों को रोजगार का जरिया बनाया हुआ है, जिसमें शोध और विकास का दूर दूर तक लेना देना नही है।

सत्तर के दशक की समाप्ति तक हिन्दुस्तान के हर सूबे में विज्ञान को काफी प्रोत्साहन दिया जाता रहा है। जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक विज्ञान प्रदर्शनियों की धूम रहा करती थी। विज्ञान विषय पर वाद विवाद के साथ ही साथ विभिन्न माडलों के माध्यम से विद्यार्थियों को विज्ञान के चमत्कारों से रूबरू करवाया जाता था। इसके बाद नौकरशाही और बाबूराज के बेलगाम घोडों ने विज्ञान का रथ रोक ही दिया। अब बमुश्किल ही विज्ञान प्रदर्शनियों के बारे में कहीं सुनने को मिल पाता है।

प्रधानमंत्री अगर वाकई चाहते हैं कि देश में विज्ञान के प्रति युवा आकषिZत हों तो उन्हें लगभग तीस साल पुराना इतिहास खंगालना पडेगा, और देखना होगा कि सत्तर के दशक तक विज्ञान के प्रति विद्यार्थियों की रूचि का कारण क्या था, और आज चाहकर भी शिक्षण संस्थाएं उनमें विज्ञान के प्रति आकर्षण क्यों पैदा नहीं कर पा रही हैं।

जहां तक प्रवासी भारतीय वैज्ञानिकों की वतन वापसी का सवाल है, तो इसका तहेदिल से स्वागत किया जाना चाहिए। भारत के दिमाग का इस्तेमाल कर विश्व के अनेक समृद्ध देश अपने आप को बहुत आगे ले जाते जा रहे हैं। भारत सरकार को चाहिए कि भारत वर्ष में एसा माहौल तैयार करे ताकि देश की प्रतिभाएं देश में ही रहें विदेश पलायन के बारे में उनके मानस पटल पर कभी विचार तक न आए।

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